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Monday, August 16, 2021

सासु माँ, ससुराल और मैं शैलजा ....... सास - बहू - नंद - महावारी कोई पाप नहीं, बल्कि एक वरदान है ईश्वर का - कहानी भाग - 6

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सासु माँ, ससुराल और मैं शैलजा .......

सास - बहू - नंद - महावारी कोई पाप नहीं, बल्कि एक वरदान है ईश्वर का - कहानी भाग - 6

आज शैलजा एक नई वजह से टेंशन में थी,...... नहीं नहीं कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी, बात तो बहुत छोटी सी है , पर शैलजा बहू है ना तो इस वजह से बात थोड़ी बढ़ गयी ।

दरसल आज से कुछ पांच छ: साल पहले तो इन बातों पर कोई खास बात होती भी नही थी। कि, पाँच छः साल पहले ये बातें घर की बेटी के साथ होती थी।



अब आप सोच रहे है ना, ऐसा भी क्या हो गया, जो फिर से बहू - बेटी वाली बात हो गयी। नहीं जनाब, इस बार बात बहू बेटी नहीं, बल्कि बहू बेटी के बच्चों की है।

दरअसल, जब शैलजा शादी करके अपने ससुराल में आई थी, तो बस कुछ दिन बाद ही उसकी नंद अपने बेटे के साथ वह रहने आ गयी थी। उसी समय शादी को कुछ ही समय हुआ था उसकी, उसकी नंद का बेटा उसने अपनी गोद में पकड़ा था और वो अपनी सास और नंद के साथ बैठी थी, तब उसकी सास ने उससे एक बात कही थी जो अब हर वक़्त उससे सच लगती है, उन्होंने हंसते हुए उससे बोला था,  "बेटी के बच्चे माँ को ज्यादा प्यारे होते हैं, बहू के बच्चे उतने प्यारे नहीं होते " । शैलजा को बहुत बहुत ज्यादा बुरा लगा था उस वक़्त , जबकि तब तो उसने इस बारे में सोचा भी नहीं था ।

पर आज जब भूमि हो गयी है तो हर पल उसे सब याद हो आता है रह रह कर।



आज शैलजा महावारी की वजह से अलग बैठी थी , उसकी बेटी भूमि अभी कुछ समझती नहीं इन चीजों को वो बहुत छोटी है, आज वो गलती से मंदिर में जाकर पूजा करने लगी और मूर्तियां छूने लगी, बस यही मुद्दा बन गया आज की बहस का , वो तो शैलजा के पति ने बीच में आकर संभाल लिया , वरना आज क्या से क्या हो जाता।

शैलजा को याद है , कुछ साल पहले शैलजा की नंद अपने बेटे जो भूमि से भी बड़ा था उसके साथ यह रहने आयी थी और उसकी भी महावारी आयी थी , शैलजा की सास पूजा कर रही थी और वहीं कुछ दूर पर उसकी नंद बैठी थी, उससे भी बड़ी बात उनका बेटा सास के साथ मंदिर में बैठा था और सास बोल रही थी बच्चे तो भगवान का रूप होते हैं, असली भगवान तो यही है। कुछ नई होता भगवान भी तो सब देख रहा है।



और आज बात भूमि की है, क्योंकि वो बहू की बेटी है तो आज वो भगवान का रूप नहीं है, आज कोई भगवान नही देख रहा।

महावारी कोई पाप नहीं, बल्कि एक वरदान है ईश्वर का,जिससे ये संसार चल रहा है। हाँ उस वक़्त एक औरत को आराम की जरूरत  होती है, इसी कारण किसी जमाने में औरत को अलग बैठाया जाता होगा, क्योंकि उस जमाने में शारीरिक परिश्रम बहुत ज्यादा था। पर वक़्त के चलते लोगो ने इसे छुआछूत मान लिया। वो भी ठीक है,  पर इसके नियम भी बेटी बहू यह तक कि उनके बच्चों के लिए भी अलग हो जाये, क्या ये सही है।

किसी भगवान ने ये नहीं कहा तो कम से कम इंसान इस सच को तो  सच्चाई से माने की नियम हम अपनी सुविधा के अनुसार बनाते हैं, उसमें भी उसने ईश्वर का नाम लेकर उसे ही आगे खड़ा कर दिया।

वाह रे इंसान , तेरी दुनियां महान।

क्या आपकी जिंदगी से भी मिलती है, शैलजा की कहानी, कृपया कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।




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Thursday, August 12, 2021

सासु माँ, ससुराल और मैं शैलजा ....... सास - ससुर, बहू - नंद, पति - जवाई और हमारा राखी त्योहार - कहानी भाग - 5

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सासु माँ, ससुराल और मैं शैलजा .......

सास - ससुर, बहू - नंद, पति - जवाई और हमारा राखी त्योहार - कहानी भाग - 5



आज राखी से एक हफ्ता पहले शैलजा फ़ोन में कैलेंडर देख रही थी, ... और उसने देखा अरे अगले हफ्ते राखी है, उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी, पर थोड़ी ही देर में उसे पिछले साल का यही दिन याद हो आया।वो अपनी यादों में उस दिन को ऐसे याद करने लगी मानो ये सब कुछ उसकी आंखों के सामने हो रहा हो।.......

राखी का दिन था, शैलजा आज सुबह जल्दी उठ गयी। आज उसे बिना किसी के ताने सुने बिना अपने घर यानी अपने मायके जाने की आजादी प्राप्त थी। वो सारा खाना बना कर तैयार हो गयी।

उसके पति सुबह उठते ही उसके लिए मिठाई का डब्बा ले आये, ताकि उसे बाद में देर न हो जाये।वो इतनी खुश थी की उसके पति को उसकी कितनी परवाह है।



उसकी छोटी नन्द,  सुबह उसके खाना बनाने से पहले अपने मायके पहुंच चुकी थी, एक बड़े से मिठाई के डब्बे के साथ और उसमें से नंद ने मिठाई अपने पिताजी (शैलजा के ससुरजी) को दी, और उन्होंने आराम से खाई भी।

थोड़ी देर में शैलजा तैयार थी, वो इतनी ख़ुश थी कि इस बार मैं इतनी जल्दी जा पा रही हूँ,  दिन भर बैठ कर मैं भी आराम से शाम को आऊँगी। पर इस बात की खुंदक तो पहले ही सास ससुर को थी कि इतनी जल्दी जा रही है, पर बेटे के सामने क्या कहते।



शैलजा, जल्दी में मिठाई का डब्बा, फ्रीज में भूल गयी। रास्ते में उसे याद आया थोड़ा आगे जाकर।उसने अपने पति को बोला गाड़ी मोड़ने को, और दौड़ते हुए वो जैसे ही दरवाजे के अंदर आने ही वाली थी, वो अचानक रुक गयी। अंदर उसके ससुरजी,  उसकी सास और उसकी चींटी नंद बातें कर रहे थे। उसने ससुर जी को कहते हुए सुना, क्यों मिठाई का इतना बड़ा डब्बा लाने की क्या जरूरत थी इसे। बड़ा डब्बा यह घर के लिए लाता , उसके लिए छोटा ले आता। और वहाँ मिठाई ले जाना जरूरी था? शैलजा की सास बोली-"शादी हो गयी अब, भई, शादी करके बीवी और बीवी का मायका ही दिखता है बस, शादी के बाद लड़के माँ-बाप को कहाँ देखते हैं। हम तो अपनी लड़कियों के बदौलत हैं बस, ये देखो, पैसों की दिक्कत जो रही है कह रही है हेमलता, फिर भी मिठाई लेकर आई है एक किलो मम्मी को बूँदी के लड्डू पसंद हैं करके दो तीन दुकानों में दौड़ाया अपने पति को, ये लड़का और बहू हमें देखेंगे भविष्य में, पानी तक नहीं पूछेंगे भविष्य में, " हेमलता दी बोली- "आजकल की लड़कियां पति को माँ बाप से अलग कर देतीं हैं,  शादी क्या हो गयी, ना भाई बहन का रहता है, ना माँ-बाप का।



शादी से पहले, ऐसा था क्या ये।सब इसने सीखा दिया है, जैसा कहती है वैसा करता है।

शैलजा की आँखों में लगभग पानी भर आया था।बाहर खड़ी वो सुन रही थी और सड़क से पति ने आवाज दी, क्या कर रही हो जल्दी आओ। आवाज सुनते ही सब चुप हो गये। सास मंदिर में बैठी हुई थी और इतना सब वो मंदिर में पूजा करते हुए भगवान के सामने बोल रही थी। शैलजा के अंदर घुसते ही सब चुप हो गए, जैसे उन सबको साँप सूंघ गया हो।

हेमलता दी बोली, क्या हुआ....? अरे तेरी मिठाई यहीं छूट गयी, मैं फोन करने की सोच ही रही थी, बातों में लग गयी।



शैलजा ने मिठाई का डब्बा उठाया सिर्फ इसलिए कि नहीं ले जाउंगी तो पति को बुरा लगेगा, वो बेचारे तो सुबह ही तैयार थे उसे मायके पहुंचने को।

शैलजा का मन तो किया था, मिठाई का डब्बा अपने सास ससुर और नंद के आगे पटक दे और ससुर जी को बोले पापाजी,  आपको अपने लड़के की लायी मिठाई खटक रही है,  पर जो मिठाई आपकी बेटी लायी है वो भी तय किसी का बेटा लाया है, बेटी का पति लाये तो आपको बुरा नहीं लगा क्या?



सास से वो कहना चाहती थी-"मम्मी जी, शादी तो आपकी बेटियों की भी हो गयी है, क्या आपके जवांई के बारे में भी आपकी यही सोच है, ...? आपके जवाई अपनी बीवी के मायके के लिए तीन- चार दुकानों में दौड़े हैं,  और आपका लड़का जो उसे पसंद हो वो ले कर आया है,  मैन तो आपके बेटे को नहीं दौड़ाया की मेरे घर वालों को जो पसंद है वही लाना।ये तो छोड़िए, मैने तो आपके बेटे को अपनी पसंद की  चीज लेने को भी नही दौड़ाया कभी।तो आपकी बातें किस पर ज्यादा लागू होती हैं आपके बेटे पर या आपके जवाई पर।

और हेमलता दी आप-आप तो भूल ही गयी आप भी तो आजकल की ही लड़की हैं, क्या अपने अपने ससुराल जाकर अपने पति को अपने सास-ससुर से अलग कर दिया है, ....? क्या आपके पति अब अपने माँ बाप और अपनी बहनों से अलग हो गए।

और आपके पति शादी से पहले ऐसे अपनी बहनों के लिए दुकानों में जाते होंगें,  मिठाई लेने,  तोहफे लेने। पर शादी के बाद आपके मायके के लिए ला रहे हैं क्योंकि आपके लिए उनके कुछ फ़र्ज़ हैं।पर,  आपका भाई अगर अपनी बीवी या उसके मायके के लिए गलती से कुछ कर दे, तो वो जोरू का गुलाम और जवाई-हमारा जवाई तो देवता है, पर बेटा हाथ से निकल गया।



ऐसा जवाई सबको मिले,  पर ऐसा बेटा और बहू किसी को न मिले।

इतनी बातें मन में दबा कर, भरे मन से उस मिठाई के डब्बे को हाथ मे उठाई शैलजा,  पति के दूसरी आवाज देने पर बिना किसी से कुछ कहे, सिर्फ माँ की सीखों की वजह से, किसी से बिना अपने मन का गुबार निकाले बिना,  बाहर आ गयी।

आज पहली बार उसे अपनी माँ के संस्कार गलत लग रहे थे, जिन्होंने उसे अपने ससुराल वालों की इज्जत करना, उन्हें गलत न कहना सिखाया था।पर यही वो लोग थे, जो उसे उसके घरवालों के लिए ऐसी सोच रखते हैं और उससे भी ज्यादा अपने सगे बेटे को भी इन्ही लोगों ने अपनी ऐसी सोच की वजह से दूर कर दिया ह, क्योंकि अब घर मे बहू आ गयी है।

अचानक, शैलजा के पति ने हॉर्न बजाया,  जो ऑफिस से आ गए थे, ..... वो पिछले साल की घटना से बाहर निकल आयी और इस घटना के बाद उसने निश्चय कर लिया कि वो अपने मायके जाएगी जरूर पर,..... बिना कुछ लिए, सिर्फ राखी और प्यार।



और उसे पता था उसके मायकेवाले उसे कितना प्यार करते हैं, उसे कोई इन चीजों के लिए कुछ नहीं सुनाता।

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Wednesday, August 11, 2021

सासु माँ, ससुराल और मैं शैलजा ....... सास बहू और पति - कहानी भाग - 4

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सासु माँ, ससुराल और मैं शैलजा .......

सास बहू और पति - कहानी भाग - 4



शैलजा का हर नया दिन आने साथ, एक नई कहानी लेकर आता है। आज शैलजा, पति को ऑफिस भेजकर जब नहाने गयी, तो बाहर से उसकी सास सुनाने लगी सब्जी  खाली नहीं की अबतक, कौन करेगा इसे खाली, पता नहीं किसके लिए रखा है इतना बड़ा बर्तन,.....



पहले तो शैलजा को कुछ समझ नहीं आया ,..फिर वो समझी की शायद उसकी सास को ऐसा लग रहा है कि उसने ना नाश्ता कर लिया और सब्जी ज्यादा ले ली। दरअसल, पति को नाश्ता देते वक़्त उससे सब्जी कटोरे में ज्यादा निकल गयी थी, तो शैलजा ने सोचा कहीं भूमि न उठ जाए इस वजह से कटोरे की सब्जी वो फ्रीज में रख आयी। उसने सोचा,पहले नहा लूँ, कपड़े धो लूँ, फिर रसोईघर के काम करूँगी।



पर उसकी सासूमाँ ने बिना कुछ सोचे उसे स्नानघर के बाहर से सुनाया और सुनाकर चली गयी।

थोड़ी देर में वो रसोई में खाना बनाकर, भूमि के पास कमरे में गयी, तो कुछ देर में उसके ससुरजी बाहर से उसकी सासूमाँ से बोलते हुए उसे काफी सारी बातें सुना गए,....



वो बस चुपचाप रोती रही और उसकी बेटी भूमि जो बहुत ही छोटी सी थी ,वो बस मम्मी चुप हो जा न प्लीज,... बोलते जा रही थी, उसे लग रहा था, शायद उससे कुछ गलती हो गयी है,...

छोटी सी बच्ची को देखकर शैलजा ने उसे गोद मे लेकर गले लगा लिया और वो खुद को समझाने लगी, बच्ची के लिए में खुश रहूँगी,  इस सोच वो दिन भर के काम में लग गयी।



शाम को खाना बना वो अपने मोबाइल में लग गयी, कुछ पुराने दोस्तों का बर्थडे था उन्हें विश करके, उनमे से एक उसके कॉलेज का पुराना दोस्त था, उसका बर्थडे कुछ दिन पहले दिख रहा था नोटिफिकेशन में, तो शैलजा ने "बी लैटेड हैप्पी बर्थडे" बस इतना सा लिख कर एक पुराने दोस्त को भेज दिया।

भूमि आ गयी इतने में, माँ भूख लग गयी करके, शैलजा रसोई में जाकर रोटी बनाने में लग गयी। फिर भूमि को खिलाकर वो अपने पति के पास आई कहना पूछने, पतिदेव बोले, हाँ-हाँ ले आओ भूख लगी है,....

वो खाना लाने चली गयी,...जैसे ही वो अपने पति को खाना देने लगी, वो बोले, ले जाओ मुझे भूख नहीं है। वो कुछ समझी नही, अभी-अभी क्या हो गया कि भूख मिट गई।

कुछ देर बाद पति बोले, "बी लैटेड हैप्पी बर्थडे" लिखा जा रहा है अब तो कॉलेज फ्रेंड्स को,...



तब शैलजा को समझ आया अरे अभी थोड़ी देर पहले मैंने सबके बर्थडे विश किये,...बस एक पुराना दोस्त, जो एक लड़का था, उसे भी विश कर दिया,... और उस फ्रेंड ने हार्ट वाली इमोजी भेज दी,... बस ,.....फिर क्या था,.. रात भर लड़ाई, उनकी आपस की लड़ाई खत्म हुई,,,,तो दिन में पतिदेव के ऑफिस जाने के बाद शैलजा के सास-ससुर आज उसे बाहर से सुना रहे थे कि बस रोज काम कुछ है नहीं, जब देखो जोर जोर से लड़ते हैं, लड़ाई-लडाई,....

दरअसल आज तो और अच्छा बहाना मिल चुका था उन्हे, उसे बातें सुनाने का, वो भी उस बात और, जिससे उन्हें कोई मतलब नहीं था, बस बेटा लड़ रहा है तो ये तो और अच्छा मौका है सुनाने का,....।

क्या कभी आपकी जिंदगी में भी ऐसा होता कि, शैलजा की तरह बिन गलती के, बिन बात के, आपसे लड़ाई कर दी जाती है, क्योंकि आपको अपने मन से फैसले लेने का अधिकार नहीं,... या आपको उन चीजों के लिए सुनना पड़ता है, ...जिसके लिए आपको सांत्वना दी जानी चाहिए थी,....।



क्या आपकी कहानी शैलजा से मिलती है ,...कमेंट करके जरूर बताएं,....।


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Friday, July 30, 2021

सासु माँ, ससुराल और मैं शैलजा ....... सास बहू और मायका - कहानी भाग - 3

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सासु माँ, ससुराल और मैं शैलजा .......


सास बहू और मायका - कहानी भाग – 3


आज सुबह बैठे बैठे बस शैलजा एक ही बात सोचे जा रही थी......जिस ससुराल को जोड़े रखने के लिए वो एक रोबोटिक गुड़िया बनी रही,  हर चीज चुपचाप सहन करते गयी,  गलत-सलत सब कुछ...... आज उसी चुप्पी की वजह से सबने उसको "मौनी गुड़िया " समझ लिया| एक ऐसा बेजान खिलौना,  जिसके सामने सब एक एक करके अपनी भड़ास निकालें और वो बस मुस्कुराते रहे|

कहते हैं ना,  अति किसी चीज की अच्छी नही होती|  माता सीता के दर्द की जब अति हो गयी,  वो सती होकर भी बस परीक्षा पर परीक्षा,   दुख पर दुख सहती रही,  पर अति होने पर धरती माँ फटी और वो उसमें समा गयी| कभी कभी किसी को सीधा समझ कर उसकी अच्छाई का इतना भी फायदा नही उठाना चाहिए कि उसे जीने से मारना अच्छा लगे|



आज शैलजा सोचने लगी,   मेरा मायका,  जहाँ कभी किसी की छोटी से छोटी बात तक सहन नहीं कि आज ससुराल में हर किसी की गलत से गलत बात पर चुप रही| आठ साल हो गए हर गलत से गलत बात सहन करते करते अपने से लेकर अपने उन लोगों के लिए तक जिन्होंने हमे पालने में अपना जी जान लगा दिया| उनके नाम पर तक कहना न कहना बोल गए हैं सब | सब कुछ चुप्पी के साथ सहन किया,  बिना किसी से कुछ कहे| मन करता था इनको भी बताऊं कितना गलत बोलते हैं किसी और कि लड़की से,  .... पर माँ के संस्कार कहो या घर को जोड़ कर रखने की चाह,   जिनको मुझसे कुछ कहने में शर्म आनी चाहिए थी,  जिनको शैलजा ताने मार कर चुप कर सकती थी,   वो उसी घर पर रहकर शैलजा को हर छोटी बातों पर ताने मरते थे, सुबह से रात को सोने तक| यहाँ तक तीन या चार में पड़ने वाले बच्चों के भीतर तक शैलजा की सासु माँ ने इतना जहर भरा था उसके खिलाफ,   की वो बच्चे तक आकर उसे सुना गए,  और शैलजा की सास हंसते रही सब सुनकर|  खैर........



शैलजा,   पाँच-छः महीने बाद बड़ी मुश्किल से अपने मायके गयी,  सिर्फ एक रात रहने को,  दिन में जाकर अगली शाम को घर पहुँच गयी|  लेकिन सिर्फ एक रात  रहने में उसके घरवालों को जाने किस चीज की खुंदक लगी,  हर किसी से तो वे यही कहते थे कि,   वो कुछ काम नही करती,  फिर भी जाने क्यों इतना बुरा लग गया  उन्हें|  अगले दिन जब शैलजा घर पहुंची तो सबका व्यवहार बदला हुआ|  शैलजा की बेटी भूमि जब अपने घर पहुँची एयर सबसे मिली तो शैलजा के सामने उससे सबने पूछा,  .... क्या दिया तेरे ननिहाल वालों ने.....पर शैलजा इस बात पर ध्यान न देकर रसोई में लग गयी|  उसे अंदाजा भी नहीं था वो सब उसे क्या सुनाना चाहतें हैं| वो सबको अपने घरवालों की तरह समझती है,  जो ऐसी चीजों से मतलब ही नही रखते की कौन क्या कर रहा है| किसने क्या दिया क्या नहीं दिया|



अगले दिन सुबह शैलजा के पति ऑफिस जा रहे थे उन्हें आफिस भेजकर वो नहाने की तैयारी कर ही रही थी वो रसोई में दाल रखने आई वो सोच रही थी भूमि के उठने से पहले काम कर लूं| जब वो काम करने लगी जल्दी में,  तब उसकी सासु माँ आयी आकर बोली तू भूमि को दूध पिलाएगी आज,  वो जल्दी में "हाँ" बोल गयी,  उसे तो अंदाजा भी नहीं था कि उनके मन में चल क्या रहा है....सासूमाँ बोली- "कल तू इतने दिनों बाद मायके गई थी,   भूमि और तेरे हाथ में पैसे दबाये होंगे उससे मंगा ले| शैलजा कुछ सेर चुप रही | वो इतना ही सुनती तो चुपचाप बात सुन के भूल जाती,  पर अब तो उसकी सास गुस्से से बोलने लगी-"इतने दिनों बाद गयी पैसे दबाये या नहीं?"इस बार शैलजा के सब्र का बांध टूट गया वो बोली -"क्यों?"

उसकी सास सात-आठ बार पूछती रही- "पैसे दबाये या नहीं दबाये"?

और वो भी बस बोलती रही- "क्यों"?



जब एक ही जवाब सुन के गुस्से में तमतमा गयी तो गुस्से से रसोई से बाहर निकलते हुए बोली जो पैसे दिए हैं उनसे मंगा ले दूध|  उस दिन शैलजा को लगा मेरे लिए तो नाराजगी समझ आती है में इनके घर का खा रही हूँ,   पर मेरे घर वालों के बारे मे कुछ भी कहने का क्या मतलब?अगर पैसे दिए या नहीं दिए उससे मेरी बेटी कबतक दूध पीयेगी| उस दिन शैलजा ने कसम खायी आजतक हर ताना सुन के भी लगी रही,   आज के बाद इनके अमूल्य दूध की न मैं चाय पियउँगी न मेरी बच्ची| भले ही बिना दूध पिये रह ले मेरी बच्ची|



आज वो फिर दोहरा चेहरा दिखा सासूमाँ का,   "जो कोई आये तो उसके सामने इतना प्यार भरा होता था,  जैसे शैलजा सासूमाँ की सगी बेटी हो,  पर जब कोई न हो तो सिर्फ ताने और हर काम में कमी| "

अगर घर में कोई और होता या नंदे आयी होती तो यही सासूमाँ बोलती -मायके जरूर जाना चाहिए,   सबको अपने मायके की याद आती है,   कोई कुछ लेने जो क्या जाता है अपने मायके|  आज घर में जब अकेली थी तो मन की असली भडास निकाल दी|



बस....बैठे बैठे कमरे में बाहर से बातें सुनते हुए,   एक तरह से जो उसे जानबूझकर सुनाई जा रही थी अकेले में वो सुनते हुए वो सोचे जा रही थी,  -"रोबोटिक गुड़िया" बनना संस्कार नही कलयुग में बेवकूफी है| सहन करते रहकर "मौनी गुड़िया" बन जाना,  बेजान खिलौना बनने जैसा है,  जो बस कुछ भी सुने,   कितना भी करे,  उसे बस बुरा बोल कर हर बार उससे खेलकर उसे तोड़ दिया जाये|

आगे की कहानी शैलजा की जुबानी देखने के लिए देखिये अगला भाग,  ......




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